बीच सड़क में
खड़ा सिपाही,
था डंडा बरसाने को बेताब।
भीड़ में अगर पिट जाए
उसका अपना बेटा,
तो क्या कहेगा उसको बाप?
सत्ता के गलियारों में बन गए हैं
कई हज़ारों बिल,
जिनसे निकलकर आए हैं बाहर
-न्याय और सच को डसने वाले-
वर्दी पहने साँप।
कल तक जो खेतों में
माटी से सोना बोता था,
आज उसी के माथे पर
लिख दिया गया अपराध—
किससे माँगे वह अपने
पसीने का हिसाब?
जिस हाथ ने ईंटें जोड़कर
ऊँचे महल बनाए,
उस हाथ की रेखाओं में
क्यों भूख लिखी रह जाती है?
क्यों मेहनत का फल बन जाता
जीवन भर का संताप?
कुर्सी पर बैठे चेहरों ने
लगता है कानों में रुई भरी है,
सड़कों पर चीख रही जनता,
संसद फिर भी मौन खड़ी है।
बताओ ज़रा की लोकतंत्र के माथे पर
यह कैसा काला अभिशाप?
नारे उनके मीठे-मीठे,
वादे उनके भारी,
चुनाव गया तो भूल गए वे
जनता की लाचारी।
अब अगले कुछ बरस तक
हम कैसे दिखाए उनको अपना प्रताप?
भूखी माँ की सूनी आँखें,
बच्चे का खाली कटोरा,
राजमहल में उत्सव चलता,
जलता रहता घर-घर चूल्हा।
हम किसके दर पर जाकर रोए
और रखे अपना दुख और विलाप?
कलम उठे तो देशद्रोही,
मुँह खोले तो गद्दार,
सच बोले तो जेल मिलेगी,
झूठ बनेगा अख़बार।
कब तक तुम्हारे हाथों में रहेगा
देशभक्ति का माप?
याद रखो, ये मौन खड़े लोग
पत्थर नहीं, अंगारे हैं,
इनकी आँखों में दबे हुए
सदियों के दुख सारे हैं।
जिस दिन टूटेगा यह सन्नाटा,
तुम सह न सकोगे उसका ताप।
डंडा थामे खड़े सिपाही,
तुम भी इसी ज़मीन के हो,
जिन पर बरसाते हो लाठियाँ,
तुम भी उन्हीं के दीन के हो।
वर्दी से पहले मनुष्य बनो,
वरना होगा तुम्हें पश्चाताप।
सत्ता के मद में चूर न होना,
वक़्त सभी का आएगा,
जनता जब इतिहास लिखेगी
तब हर सिंहासन ढह जाएगा।
और वह दिन तब होगा
जिस दिन प्रश्न करेगा बच्चा—
कौन था कातिल?
क्या था वो मेरा बाप?
याद रखना
एक दिन
तुम्हारी कुर्सी की गर्मी
ठंडी पड़ जाएगी,
दरबार बदलेंगे,
चेहरे बदलेंगे,
और सत्ता के गलियारों में
गूँजती हुई आवाज़ें भी बदल जाएँगी।
आज जिस कुर्सी पर बैठकर
तुम उसकी मर्यादा रौंद रहे हो,
आज जो पद की प्रतिष्ठा को
अपने अहंकार की धूल में
मिला रहे हो—
तुमसे बस इतना कहना है:
याद रखना।
याद रखना
कि तुमने संविधान की पंक्तियों को
खुद की सुविधा की ख़ातिर
अर्थहीन कर दिया था।
याद रखना
जब मानवता को तुम्हारे द्वारा
सड़कों पर घसीटा गया था,
और न्याय
बंद कमरों में
अपनी बारी की
प्रतीक्षा करता रह गया था।
याद रखना
जब धर्म को आस्था नहीं,
हथियार बनाया गया था—
उस धर्म को भी
जिसके तुम स्वयंभू रखवाले
बने फिरते थे।
याद रखना
जब उन हाथों पर
लाठियाँ बरसाई गई थीं
जिनके आगे
हर चुनाव में
तुम वोट की याचना लेकर
झुक जाते थे।
याद रखना
उन चीखों को
जिन्हें नारों के शोर में दबा दिया गया,
उन प्रश्नों को
जिन्हें देशद्रोह कहकर टाल दिया गया,
और उन आँखों को
जिनसे भविष्य का सपना
छीन लिया गया।
सब याद रखना।
क्योंकि हम भी याद रखेंगे।
हम याद रखेंगे
तुमने सत्ता में रहकर
क्या-क्या किया,
किसे कुचला,
किसे चुप कराया,
और किसके नाम पर
देश को बाँटा।
मगर सुनो—
जब समय करवट लेगा,
जब जनता फिर
सत्ता के केंद्र में लौटेगी,
हम तुम्हारे साथ
वह नहीं करेंगे
जो तुमने हमारे साथ किया।
हम प्रतिशोध को
न्याय का नाम नहीं देंगे,
हम नफ़रत को
शासन की भाषा नहीं बनाएँगे,
हम असहमति को
अपराध नहीं कहेंगे।
हम तुम्हें दिखाएँगे
कि सत्ता डर से नहीं,
विश्वास से चलती है;
कि देश लाठियों से नहीं,
संविधान से चलता है;
कि कुर्सी किसी शासक की जागीर नहीं,
जनता की अमानत होती है।
और यह भी—
कि सत्ता बदलना
सिर्फ़ चेहरे बदलना नहीं होता,
सत्ता बदलना होता है
उसका चरित्र बदलना।
याद रखना।
हम हिसाब माँगेंगे,
पर इंसानियत नहीं छोड़ेंगे।
हम न्याय करेंगे,
पर तुम्हारे जैसे नहीं बनेंगे।
हम ऐसा न्याय करेंगे
जिसे तुम भी अन्याय नहीं कह सकोगे।
जय हिंद।